Friday, 17 June 2016

Patience

पानी को बर्फ में,
बदलने में वक्त लगता है !!
ढले हुए सूरज को,
निकलने में वक्त लगता है !!
थोड़ा धीरज रख,
थोड़ा और जोर लगाता रह !!
किस्मत के जंग लगे दरवाजे को,
खुलने में वक्त लगता है !!
कुछ देर रुकने के बाद,
फिर से चल पड़ना दोस्त !!
हर ठोकर के बाद,
संभलने में वक्त लगता है !!
बिखरेगी फिर वही चमक,
तेरे वजूद से तू महसूस करना !!
टूटे हुए मन को,
संवरने में थोड़ा वक्त लगता है !!
जो तूने कहा,
कर दिखायेगा रख यकीन !!
गरजे जब बादल,
तो बरसने में वक्त लगता है !!

Pehchan


Uthane se leharo ke sagar me hui zara hulchul
jaise lehron ne chaha pana bas kisi ko ek pal.
Baarish ki bundein bhi giri sagar me,
nadiyan bhi jake mili sagar me,
lekin aietraz hai sabko lehron ke uthane se sagar me.
Hui lgon ko shikayat tez leharon se,
chaha unhone ki ho jaye wo dur sagar se.
Mila sagar ki leharon ko toofan ka naam,
lekin kar nahi sakta koi sachhe pyaar ko badnaam.
Duniya ki nazron me lehrein toofan ban gayi,

par sagar ke liye wo, uski pehchaan ban gayi.

Love Poem

Dhoop Ho Chhaaon Ho Tum Saath Nibhaaya Karna....... !
Mere Chehre Pe Sada Palkoon Ka Saaya Karna....... !

Raah Dekhungi Tumhaari Main Sar-E-Shaam Yunhi....... !
Kabhi Jaldi Kabhi Der Se Aaya Karna....... !
... 
Daant Lena Sar-E-Mehfil Koi Baat Nahi....... !
Phir Akele Mein Gale Laga Kar Manaaya Karna....... !

Jaan Jaungi Mein Khushboo Se Tumhaari Tum Ko....... !
Tum Peeche Se Meri Aankhoon Ko Chupaaya Karna....... !

Jaagna Chahun To Raat Bhar Baatein Karna....... !

Nind Aa Jaaye To Seene Par Sulaaya Karna....... !

बेटियाँ

पता नहीं कब

बड़ी हो जाती हैं बेटियाँ

जैसे

बड़े होते हैं पेड़

बड़े होते हैं दिन

बड़ी होती हैं रातें

 

पता नहीं कब

ओढ़ लेती है चादर

शर्म –ओ- हया के

 

पता नहीं कब उसका शरीर

बन जाता है

शरीर कहलाने लायक

 

पता नहीं कब

खिल जाते हैं फूल

खिल जाती है बेटियाँ

मुरझा जाते हैं फूल

मुरझा जाती हैं बेटियाँ

 

पता नहीं कब

बुहारन बन जाती हैं बेटियाँ

लाख कोशिश के बावजूद चौखट में

फंसी रह जाती हैं बेटियाँ

 

पता नहीं कब

उसके बाल कंघी में

उलझने लगते हैं

 

पता नहीं कब

माँ का स्नेहिल आँचल

बन जाता है

इज्जत ढकने का वस्त्र

कंधे झुक जाते हैं

जब आती हैं बेटियाँ

आँखे भर आती हैं

जब जाती हैं बेटियाँ

 

पता नहीं कब

आती हैं बेटियाँ

और क्यों

चली जाती हैं बेटियाँ……|

जब बेटी

पलकों को बंद करके
नन्ही परी सो जाती है
जाने दूर सपनो में
कही खो जाती है
ठक ठक भरती कदम
होल होल उठाती है
अपने आप में खोई
गुड़ियों से बतलाती है
मुड़कर देखती है
बड़ी माशूमियत से कभी
छोटी सी तितली
टूटे दांत दिखाती है
बड़ी प्यारी हैं बातें उसकी
तोतली जबान भाती है
किसी वीणा सी बज़ती है
जब वो खिलखिलाती है
गूस्सा उसका तीखा है
मिजाज थोड़ा फीका है
ओढ़ती है माँ की चुनरी
और माथे पर टीका है
जिद उसकी हठीली है
लड़की छैलछबीली है
नाजुक सा पंख है वो
गुड़ियाँ रंग रंगीली है
छुपना छुपाना उसका
मन मन मुस्काना उसका
अचानक घबराना उसका
आखें फिर दिखाना उसका
वो एक दीयाबाती है जिससे
जिन्दंगी जगमगाती है
मेरी रूह चैन पाती है
जब बेटी गले लग जाती है

एक बचपन का जमाना था


एक बचपन का जमाना था, जिस में खुशियों का खजाना था..
चाहत चाँद को पाने की थी, पर दिल तितली का दिवाना था..
खबर ना थी कुछ सुबहा की, ना शाम का ठिकाना था..
थक कर आना स्कूल से, पर खेलने भी जाना था..
माँ की कहानी थी, परीयों का फसाना था..
बारीश में कागज की नाव थी, हर मौसम सुहाना था..
हर खेल में साथी थे, हर रिश्ता निभाना था..
गम की जुबान ना होती थी, ना जख्मों का पैमाना था..
रोने की वजह ना थी, ना हँसने का बहाना था..
क्युँ हो गऐे हम इतने बडे, इससे अच्छा तो वो बचपन का जमाना था

लिख दो

लिख दो
कि अब बूँदा बाँदी नहीं है
बादल सरकते नहीं
उड़ते हैं
बरसते नहीं, फटते हैं।
सूरज तापमान दिखाता है,
उँचा और ऊँचा।
विद्यालय के कंधे
हल्के हो गये हैं,
कोंचिंग की आदत
सर्पाकार हो चुकी है,
अंग्रेजी की धुंध में
कुछ दिखाई नहीं देता।
चिट्ठी आती नहीं
उत्सुकता बनती नहीं।
समय आता है
पर किसी और के लिये,
हाथ हमारे नहीं
किसी और के हैं,
कदम वे नहीं
अलग लगते हैं।
शहर का मिजाज
बदला-बदला है,
बरफ में हमारा हिस्सा नहीं
सड़क पर हमारी ताकत नहीं,
लेकिन शब्द तो भिनभिनाते हैं
पुस्तकालयों में,इन्टरनेट पर,
धरती पर हमारा हिस्सा है
आकाश में हमारे नक्षत्र हैं।
लिख दो
अभी धड़कता है दिल
पहले की तरह नहीं
आज की तरह , धीरे-धीरे,
कहता है बातें
पहले की नहीं, आज की,
इतने बर्षों में इतना इतिहास तो बनता है।