Wednesday, 5 October 2016

सपने तभी पूरे होते हैं......

  • सपने तभी पूरे होते हैं, जब सपनों को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत की जाए. वरना सपने देखते-देखते हीं जिंदगी गुजर जाती है और  कोई भी सपना पूरा नहीं होता है.
    दिन-रात मेहनत → सपने पूरे………….
  • सपनों को ख्वाबों से हकीकत की जमीन पर उतारने के लिए, पूरी दुनिया को भूल कर कठिन परिश्रम करना पड़ता है.
  • लोग तबतक आपके सपनों का तबतक मजाक उड़ाते हैं, जबतक आप सपने को हकीकत में नहीं बदल देते हैं. और जब आप सफल हो जाते हैं तो आपका मजाक उड़ाने वाले लोग भी आपकी तारीफ में कसीदे पढ़ने लगते हैं. 
  • अगर आप चाहते हैं कि आपके सपने पूरे हों, तो सबसे पहले आपको सपने देखने होंगे. – अब्दुल कलाम
  • जिन्हें सपने पूरे करने की लत लग जाती है, वो दिन-रात देखे भी काम करते हैं.
  • जिन लोगों की आँखों में सपने नहीं होते हैं, वे साधारण जिंदगी जीते हुए मर जाते हैं.
  • अगर आप केवल सपने देखेंगे और उन्हें पूरे करने के लिए कोई कोशिश नहीं करेंगे, तो आपकी जिंदगी बदतर होती चली जाएगी.
  • जो लोग खतरा उठाने की हिम्मत करते हैं, केवल उन्हीं लोगों के सपने पूरे होते हैं.
  • कुछ बनने के नहीं, कुछ करने के सपने देखो.
  • जिसे अपने वर्तमान को बर्बाद करने की आदत हो, उनके सपने आँखों में हीं दम तोड़ देते हैं.
  • ये जिंदगी खुद एक खूबसूरत सपना है, लेकिन जिंदगी की भागदौड़ में हम इस सुनहरे सपने को जीना भूल जाते हैं.
  • सपने बीज की तरह होते हैं. जैसे हर बीज बड़े पेड़ में नहीं बदलता, वैसे हीं हर सपना सफलता में नहीं बदल पाता है.
  • मेहनत के बिना सपने अपना महत्व खो देते हैं.
  • अच्छे लोगों के सपने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं.
  • सच्चे प्यार को पाना ज्यादातर लोगों के लिए एक सपना हीं रह जाता है. और वे हालात के साथ समझौता कर लेते हैं.

क्या लिखूं ?

क्या लिखूं   ?
मन की कहानी लिखूं
या आँखों का पानी लिखूं
क्या लिखूं  ?
तितलियों का शरमाना लिखूं
या भँवरो का गुनगुनाना लिखूं
क्या लिखूं   ?
हवाओं की झनकार लिखूं
या कोयल के गीत सदाबहार लिखूं
क्या लिखूं   ?
बादलो में चाँद का छिप जाना लिखूं
या सूरज का हर रोज मुस्कुराना लिखूं
क्या लिखूं   ?
धरती का श्रृंगार लिखूं 
या बूंदों का उपहार लिखूं
क्या लिखूं   ?
फूलों की महक लिखूं
या पत्तों की खनक लिखूं
क्या लिखूं   ?
गंगा की पावनता लिखूं
या नारी की शालीनता लिखूं
क्या लिखूं   ?
दीपक का जलना लिखूं
या अंधकार चीरकर आलोक का पथ गढ़ना लिखूं
क्या लिखूं   ?
तारों का टिमटिमाना लिखूं
या मेरा उन्हें निहारते जाना लिखूं
क्या लिखूं   ?
पंछियों का चहचहाना लिखूं
या कलियों का चटकना लिखूं
क्या लिखूं   ?
मंदिर की घंटियों की आवाज लिखूं
या मस्जिद की अजान का आगाज लिखूं
क्या लिखूं   ?
सरिता का निरंतर बहना लिखूं
या झरने का पहाड़ों से गिरना लिखूं
क्या लिखूं   ?
सर्दियो की भीनी धूप का एहसास लिखूं
या रात में पड़ती ओस का आभास लिखूं
क्या लिखूं   ?
सावन की रंगीली बहार लिखूं
या पतझड़ के मौसम का संहार लिखूं
क्या लिखूं   ?
हवाओं की मीठी धुन सुनाना लिखूं
या फसल का उस पर लहराना लिखूं
क्या लिखूं   ?
पतंगे का लौ के प्रेम में मिट जाना लिखूं
या सूर्यमुखी का भानु से नयन मिलाना लिखूं
क्या लिखूं   ?
कृष्ण की बांसुरी का संगीत लिखूं
या मीरा की उनसे प्रीत लिखूं
क्या लिखूं   ?
गुरु के चरण स्पर्श का अद्भुत सार लिखूं
या माँ के कोमल स्पर्श में बसा प्यार लिखूं
क्या लिखूं   ?
बचपन के लड़कपन का जमाना लिखूं
या बारिशो में वो बेवजह का छपछपाना लिखूं
क्या लिखूं…………………………….
क्या लिखूं…………………………….
क्या लिखूं…………………………….

जिंदगी ना मिलेगी दोबारा

क्या हुआ जो देर हो रही, एक मुकाम पाने में
क्या हुआ जो  देर हो रही, जिंदगी आसान बनाने में
क्या हुआ जो  देर हो रही, किसी रास्ते पर चल पाने में
क्या हुआ जो  देर हो रही, खुद को साबित कर पाने में
क्या हुआ अगर  देर हो रही है, अपने सपनों की दुनिया सजाने में
देर से हीं सही, पर होगी कोई बात नई
तेरी आनेवाली जिंदगी होगी खुशियाँ भरी
क्यों मुस्कुराना भूलते हो, बीती बातों को याद करके  
क्यों उलझनों में झूलते हो, वर्तमान को बर्बाद करके  
दिल में जो ख्वाब हैं, उन्हें साकार करो तुम
अपने इरादों से दिन रात प्यार करो तुम
तुझमें दम है…. तो खुद की दुनिया बनाओ तुम
जो किसी ने नहीं किया हो, कुछ ऐसा कर जाओ तुम
जो रुक गया जिंदगी के सफर में, यहाँ बस वही हारा 
जो चलता रहा जिंदगी में, वक्त ने खुद उसके जीवन को संवारा 
तुम भी जी लो जिंदगी के एक-एक पल को खुल कर  
क्योंकि जिंदगी ना मिलेगी फिर दोबारा.........

ज़िन्दगी की धूप-छाँव

कभी गम, तो कभी खुशी है ज़िन्दगी
कभी धूप, तो कभी छाँव है ज़िन्दगी . . . . . . .
विधाता ने जो दिया, वो अद्भुत उपहार है ज़िन्दगी
कुदरत ने जो धरती पर बिखेरा वो प्यार है ज़िन्दगी . . . . . .
जिससे हर रोज नये-नये  सबक मिलते हैं
यथार्थों का अनुभव कराने वाली ऐसी कड़ी है ज़िन्दगी . . . . . .
जिसे कोई न समझ सके ऐसी पहेली है ज़िन्दगी
कभी तन्हाइयों में हमारी सहेली है ज़िन्दगी . . . . . . .
अपने-अपने कर्मों के आधार पर मिलती है ये ज़िन्दगी
कभी सपनों की भीड़, तो कभी अकेली है जिंदगी . . . . . . .
जो समय के साथ बदलती रहे, वो संस्कृति है जिंदगी
खट्टी-मीठी यादों की स्मृति है ज़िन्दगी . . . . . . . .
कोई ना जान कर भी जान लेता है सबकुछ, ऐसी है ज़िन्दगी
तो किसी के लिए उलझी हुई पहेली है ज़िन्दगी . . . . . . . .
जो हर पल नदी की तरह बहती रहे ऐसी है जिंदगी
जो पल-पल चलती रहे, ऐसी है हीं ज़िन्दगी . . . . . . . .
कोई हर परिस्थिति में रो-रोकर गुजारता है ज़िन्दगी
तो किसी के लिए गम में  भी मुस्कुराने का हौसला है ज़िन्दगी . . . . . .
कभी उगता सूरज, तो कभी अधेरी निशा है ज़िन्दगी
ईश्वर का दिया, माँ से मिला अनमोल उपहार है ज़िन्दगी . . . . . . . .
तो तुम यूँ हीं न बिताओ अपनी जिंदगी . . . . . . . . 
दूसरों से हटकर तुम बनाओ अपनी जिंदगी 
दुनिया की शोर में न खो जाए ये तेरी जिंदगी . . . . . . .
जिंदगी भी तुम्हें देखकर मुस्कुराए, तुम ऐसी बनाओ ये जिंदगी.....

Wednesday, 31 August 2016

“एक परी का जन्नत”

जी करता हॅ उड जाऊं ऊंचे गगन में,
सपनों से सुंदर जग में.
पंख लगाकर परियों सी,
बन जाऊं उनकी शहजादी,
जहां हो सिर्फ आजादी.
वहां न कोई गर्दिश हो,
मुझपर न कोई बंदिश हो.
कदम रखुं जहां पर,
फुलोंभरी सेज हो राहोंभर.
हसुं जब मॅं खिलखिलाकर,
बागों में हर कलि खिले तब,
भीनी-सी खुशबु बिखेरकर.
मेरी मुस्कराहट पर सुरज देता हो जब आहट,
मेरे चेहरे की चमक से, चमके उसका आंगन.
मेरे सपनों से सुंदर आशियाने में,
कुदरत भी दस्तक दे आकर शामियाने में.
हर कोई प्यार की भाषा बोले,
आदर ऑर संस्कार हर तरफ डोले.
खुशियां जहां दॉडी चली आएं,
दुख तो कोसों दुर भाग जाएं.
मेरे इस जहां में,
खुशी ऑर प्यारभरे आमंत्रित हॅं.
आए जो मेरी गलियों में ,
जन्नत की सॅर उसे मॅं कराऊगी.
मेरी जुल्फों तले सुनहरी शाम ढले,
शमा का रुप धरे निकले झिलमिल सितारे.
जब निकले वो चांद सुहाना,
आंचल में छुप जाए समझकर अपना ठिकाना.
रातभर करुं मॅं इनसे बातें,
हरदिन सुनाएं नया फसाना.
दुआएं देकर कहें मुझसे,
रहे सलामत तुम्हारा ये जमाना.
 पर रुबरु हुं मॅं भी हकीकत से,
कि सपने नही उतरते जमी पे.
पर होते हॅं, पॅर नहीं होते इनके,
यह जन्नत तो बसा हॅ मेरे मन में,
काश हकीकत का रुप धर सकते मेरे ये सपने.

मैं पराई क्योँ….

माँ मैं तो हुँ एक परदेसी चिडिया,
ना आऊँगी आपके घर अंगना.
ढुंढा बापु ने मेरा नया बसेरा,
बिन मेरे होगा अब आपका हर सवेरा.
उस डाल को न काटना थी जहाँ आपकी बिटिया,
जाकर ढुंढोगे घर में फिर वही गुडिया.
दिलाएगी हरपल याद मेरी चीजें,
रुलाएंगी फिर मेरी नादानियोँभरी बातें.
सूना हो जाएगा अपका वो घर आंगन,
जहां छमछम पायल मेरी और बजते थे कंगन.
माँ बापु बुला फिर से मुझे पास अपने,
लौटा दो फिर से मेरे वो प्यारे पल,
कर दो अपनी लाडली बिटिया पर यह एहसान.
माँ की गोदी में जब सोती थी रखकर सिर,
सहलाती बालो को मेरे देती ममता अपार,
क्योँ छिना मुझसे मेरा प्यारा संसार.
क्योँ बन गयी गयी थी मैं आप पर बोझ भारी,
क्योँ मेरी खातिर पड गया कम ममता का आंचल ?
भुला दिया कैसे मुझे?थी मैं तो आपकी धडकन.
जानती हुं कि मेरी कमी आपको खलेगी,
पर आपकी कमी तो मुझे सदा ही रहेगी.
गंगा नहा चुके आप दोनोँ करके हमें दान,
क्या हम नहीं उन बेटोँ की तरह् इंसान.
हमें भी तो बनाया है आपने काबिल इतना,
हम भी तो बनते एक दिन सहारा आपका.
क्योँ इस दुनिया की रीत है ऐसी,
दुनिया की हर समर्पण नारी ही करती,
आसओँ से सदा वो अपनी झोली भरती,
क्योँ बेटी, बेटे का दर्जा पा नहीं सकती?

खामोशी

खामोशी अब खामोश नहीं वह भी कुछ कहती है,
खामोश चेहरों से हजार प्रश्न पूछती है.
खामोशी संग उदासी, मायुसी भी है छाई,
संग अपने अश्कों का समुंदर भी है लाई,
अश्कों में डूबी जाए खामोशी की गहराई.
खामोशी शांति नहीं है यह मन की अशांति,
किसी से कुछ न कह पाने की खामोशी ,
बिन कुछ कहे सबकुछ सह जाने की खामोशी,
बयाँ कर जाती है चेहरों को चुपके से खामोशी.
गमों के तुफान आने से पहले की खामोशी,
या फिर बिखरे जीवन पर सिमटने की खामोशी.
कोई भी पहचान न पाए है यह खामोशी क्यों?
कोई भी न जान पाए है यह मायुसी क्यों?
किसी की खामोशी एक बार तोडकर देखो,
चेहरों को पढकर उनके आसुओं को पोछ्कर तो बुझो,
गुमसुम खामोशी में एकबार महफिलें सजाकर तो देखो.
किसी को खुशियाँ देने का आनंद,
किसी को जीभर हँसाने का कदम,
तुम्हारे जीवन की खामोशी भी मिट जाएगी,
दुसरों की खुशियों संग तुम्हारी खुशी भी जगमगाएगी.
फिर न रहेगा कोई खामोश, हताश और उदास,
उनकी खुशियोंमें रंग भरकर तुम भी बन जाओगे खास…